प्रतीक्षा और श्रद्धा

by Gurwinder

एक बार एक गुफा में रहने वाले भिक्षु की अपने चेले के साथ नाराजगी हो गई और उस भिक्षु ने उसे वहां से चले जाने के लिए बोल दिया| चेला चुपचाप वहां से चला गया परंतु वह गुफा के बाहर जा कर बैठ गया| कुछ दिनों बाद जब वह भिक्षु गुफा से बाहर आया और उसने अपने चेले को गुफा के बाहर बैठा पाया| चेला भिक्षु की आज्ञा की क्या कर रहा था, उसने भिक्षु को बोला: आपने मुझे चले जाने के लिए बोला था, मैं यह पूछने के लिए यहाँ पर बैठा हूं कि मैं किधर जाऊं? भिक्षु उसकी प्रतीक्षा और श्रद्धा से प्रभावित होकर बोला: तुम कहीं नहीं जा रहे, अंदर आ जाओ, तुम्हारे सहनशीलता और प्रतीक्षा ने मेरे गुस्से को जीत लिया है| आज से आप मेरे गुरु हो और मैं आपका चेला|

नरेंद्र सिंह कपूर

पुस्तक: खिड़कियां

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