घर जाकर बोल दूंगा

by Gurwinder

पुराने समय की बात है| एक गांव में एक सेठ रहता था| उसका नाम नथूलाल था| वह जब कभी भी बाज़ार और गांव के बीच से गुजरता तो गांव के लोग उस को सलाम करते थे, वह आगे से अपना सिर हिला देता और धीमी से आवाज में बोलता, “घर जाकर बोल दूंगा|” एक बार एक जान पहचान के व्यक्ति ने सेठ को यह बोलते सुन लिया| उससे रहा ना गया और उसने सेठ से पूछ लिया सेठ जी आप ऐसे क्यों बोलते हो के घर जाकर बोल दूंगा| तब सेठ ने उस व्यक्ति को बताया कि मैं पहले बिल्कुल भी धनवान नहीं था, उस समय यह गांव के लोग मुझे नथू कहकर बुलाते थे, जबकि अब मेरे पास दौलत है तो वही लोग मुझे नथुलाल सेठ कहकर बुलाते हैं| इसका मतलब यही है कि यह सलाम और इज्जत मुझे नहीं मेरी दौलत को देते हैं| इसलिए मैं हर रोज अपने घर जाकर अपनी तिजोरी को खोल कर उसमें पड़ी दौलत को यह बता देता हूँ के आज तुझे कितने लोगों ने नमस्ते और सलाम की है| इस तरह मेरे मन में हंकार और यह गलतफहमी कभी नहीं आती के लोग मुझे इज्जत दे रहे हैं|

स्रोत: अज्ञात

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