हिस्से के रुपये

सेठ धनी राम के ढाबे पर एक ग्यारह साल का लड़का बर्तन मांज रहा था , तभी एक गाड़ी वहां पर रुकी जो के देखने में सरकारी गाड़ी लग रही थी , उसमें से एक सिपाही बाहर निकला और उसने सेठ को बोला , “ सेठ जी क्या आपको मालूम नहीं के बाल मजदूरी एक गुनाह है , यह उम्र तो बच्चों के हँसने-खेलने और पड़ाई करने की होती है . . . और तुम इन से बर्तन साफ करवा रहे हो . . . चलो साहब से जा कर मिलो .” सेठ ने गाड़ी में बैठे साहिब से बात की . . . कचहरी जाने से डरते . . . समय की नजाकत को समझते आंख बचा कर कुछ रुपए सिपाही की जेब में डाल दिए , और गाड़ी वहां से चल दी . . .

सेठ ने बच्चे को दाड़ते हुए बोला , “ चल निकल यहाँ से , खुद तो बच जायेगा और मुझे फसायेगा ”

बच्चा बोला , “ ठीक है सेठ जी, मेरा हिसाब करके मुझे मेरे पैसे दे दो , मुझको अपनी माँ की दवाई घर लेकर जानी है . . ”

“चल भाग यहाँ से , कोई रुपया-पैसा नहीं है मेरे पास ” . . यह बोल कर सेठ ने लड़के को ढाबे से बाहर निकाल दिया . . .

ज़ोर-ज़ोर से रोते हुए बच्चे को यह प्रतीत हुआ , मानो उसके हिस्से के पैसे “ गाड़ी वाला साहिब ” ले गया ,  जो उसके पड़ाई-लिखाई और हँसने-खेलने की उम्र की बातें कर रहा था . . .

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