दूध

पेरों की आवाज़ सुनते ही गहरी नींद में पड़ी बलविंदर कौर की आँख खुल गई | गली में से खिड़की के माध्यम से आ रही सिटी की शी-शी की आवाज़ ने उसके दिल की धड़कन पहले से भी तेज कर दी थी | जब उसने अपने कम्बल की थोडा सा सरका क्र देखा तो रात के पौनेह बारह बज रहे थे और सिमरन दबे पाँव दरवाजे की तरफ़ जा रही थी | शक तो उसे पिछले कई दिनों से था जब से सिमरन जब दूध गर्म होता था , अपना दूध का गिलास भर के पतीले में से पहले ही निकल लेती थी , लेकिन इतने लाड-प्यार से बड़ी की और सबसे प्यार लेने वाली पड़ी-लिखी बेटी पर बिना किसे कारन एक माँ ऊँगली कैसे उठा सकती थी |

आज रात बलवीर कौर ने सिमरन से बचा कर दूध का गिलास अलमारी के सबसे उपर वाले रखने में रख् दिया था और एक खाली गिलास में थोडा सा दूध घुमा कर सिमरन की बर्तन थोने के लिए दे दिया था |

कांपते होठो से बलबीर कौर सिमरन की बोलने लगी ,

“ बेटी , रुक जा !! ना मेरी इज्ज़त का फलूदा कर , किस लिए अपनी माँ को मारने पर तुरी हैं तूं ? ”

यह सुनते ही सिमरन ने पांव के निचे से ज़मीं खिसक गई , और वह कांपते होठो से बोली ,

“ माँ !! म . . म . . में तो बाथरूम . . ”

सिमरन के यह शब्द उसके हलक में ही अटक गये और बलवीर कौर ने अलमारी में से दूध का गिलास उठा लिया |

और उसकी आखों भर आई , और बोलने लगी ,

“ बेटी !! बस कर अब सफाई देने को, जो दूध मैंने तुम्हे चार साल पिलाया था उसकी इज्ज़त तो , तेरा यह दूध दो दिन में ही उछाल गया “

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