पराया हक

पराया हक अजी सुनते हो, यह बाबूजी की दवाई खत्म हो गई है, लेकर आना, पर्ची पकड़ाते सुखी ने अपने घरवाले जीते को कहा| सुखी कि आज कमाई कम हुई थी, सिर्फ आटा ही आया था, कल को ले आऊंगा, जीता निराश होकर बोला| चलो ठीक है, यह बोलकर सुखी अंदर चली गई और काफी देर सोचने के बाद मंजे पर लेटे जीते को बोलने लगी, सुनिए जी अपने पिंदर के दाखिले के लिए कल बहन जी आए थे, कह रहे थे कोई धार्मिक संस्था खुली है, गरीब बच्चों की पढ़ाई मुफ्त में है, मैं कहती हूं कि मैं भी वहां पर चाय पानी के काम पर लग जाती हूं, मेहनत करने में कौन सा डर है, अपने पति के उतरे हुए चेहरे पर आशा की किरण जगाते सुखी ने बोला|

चलो देख लो जैसे तुमको ठीक लगे| सुखी सेवादार की नौकरी करने लग गई| उसे 1500 रुपए महीना मिलता था| कई महीने बीत गए, अचानक सुखी को एक दिन बहुत तेज बुखार हो गया, छुट्टी भी ना ले सकी| अगले दिन काम पर गई सुखी को सेक्ट्री रणजीत सिंह ने खूब डांटा| रंजीत सिंह का संस्था में सबसे ऊपर का स्थान था, महीना खत्म होने को था उसने वेतन डलवाने के लिए चेयरमैन को चिट्ठी लिखी, के सुखजीत कौर के बिना बताए गैरहाजिर होने के लिए वेतन काटा जाए और रणजीत सिंह का वेतन बढ़ा दिया जाए|

कुछ दिनों के बाद अपना वेतन ले जाने के लिए सुखी को संदेश मिला, सेक्ट्री ने 500 का नोट सुखी को दिया और बोला “यह लो तुम्हारा इस महीने का वेतन”, और सुनो मिठाई का डब्बा दफ्तर में ले जाकर बांट देना, मेरे वेतन में बढ़ावा हुआ है| सोच में डूबी सुखी ने डब्बा पकड़ा और बाहर आ गई| उसको समझ नहीं आ रहा था, अचानक उसकी नजर सामने लिखी एक पंक्ति पर पड़ी,“हक पराया नानका उस सूअर उस गाए”|

पंक्ति पढ़ कर उसकी आंखों में एक अनोखी चमक आ गई और अपने आप को सब्र के साथ बांधती मिठाई बांटने के लिए चल पड़ी, शायद उसको पंक्ति पढ़ के बाबा नानक की कही हुई वह बात समझ आ गई थी जो धार्मिक संस्था के आगू से बहुत दूर थी|

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