इनसान और जानवर की प्रति वफादारी में फर्क

अर्ब देश के एक बुद्धिमान वज़ीर ने बादशाह की तीस साल ईमानदारी से सेवा की, परन्तु उस वज़ीर से दुखी दरबारियों ने बादशाह के कान भर दिए और उस पर गंभीर आरोप लगवा कर उसे फांसी की सज़ा करवा दी| उस समय के रिवाज अनुसार, आस पास बैठे लोगों के बीच, अखाड़े में, व्यक्ति को मौत के घाट उतरने के लिए उसके पीछे कुत्ते छोड़े जाते थे| मौत की सज़ा मिलने के एक दिन पहले वज़ीर ने बादशाह को विनती की कि उस को दस दिन की मोहलत दे दी जाए, क्योंकि वह अपने परिवार के गुज़ारे का कोई प्रबंध कर सके| उसकी इतने वर्ष की सेवा को ध्यान में रखते हुए बादशाह ने उसे मोहलत दे दी| मोहलत मिलने के उपरान्त बाद वह कुते के कमरे में गया और उन दस दिनों में उसने उन कुतो की खूब सेवा की| कुते भी अब उसे पसंद करने लग गए थे| सज़ा वाले दिन जब उस वज़ीर को मारने के लिए उस पर कुते छोड़े गए तो वह वज़ीर को मारने की जगह उसके हाथ पैर चाटने लग गए, यह देखकर बादशाह हैरान हुआ और पूछने लगा, “यह क्या हो रहा है?” वज़ीर ने कहा: आपकी ओर से मिली मोहलत के दस दिनों में मैंने इन कुतो की सेवा की है, यह मेरी सेवा का मूल्य उतर रहें हैं| आपकी तो मैंने तीस साल सेवा की है, अपने कौन सा मेरी सेवा का मूल्य उतारा है|

नरिंदर सिंह कपूर

पुस्तक: खिड़कियाँ

  • ਪੁਸਤਕ: खिड़कियाँ
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