अच्छा होना ही आवश्यक नहीं, बुद्धिमान होना भी अनिवार्य है

प्रसिद्ध मूर्तिकार माइकल एज़्लो ने जब एक मूर्ति बनाई तो उस समय के प्रसिद्ध समाज वादी आलोचक और प्रसिद्ध मूर्तिकार सार्द्रिनी वह मूर्ति देखने आए| उस मूर्ति को देख कर सार्द्रिनी ने बोला: इसकी नाक जरूरत से ज्यादा बड़ी है| माइकल एज़्लो, साथ बहस नहीं करना चाहते थे, क्योंकि उन्हें सार्द्रिनी के जरिए ही काम मिलता था| माइकल एज़्लो ने सार्द्रिनी की बात सुनने के बाद यह बोला: मैं इसको ठीक कर दूंगा, आप कल देख लेना| माइकल एज़्लो ने मूर्ति की नाक पर सफेद मिट्टी लगा दी और अगले दिन सार्द्रिनी की उपस्थिति में आहिस्ता-आहिस्ता छोटे औज़ार से वह सफेद मिट्टी उतारता रहा और पूरी मिट्टी उतर जाने के बाद बोला: यह देखो अब ठीक है| सार्द्रिनी ने ध्यान से देखा और बोला: अब ठीक है| देखा जाए तो माइकल एज़्लो अपनी तरफ से ठीक थे परंतु उन्होंने बहस नहीं की, मूर्ति बनाने का हंकार नहीं किया| सार्द्रिनी को इज्जत दी के उन्होंने महान मूर्ति को सुधारने और उसको धनवान बनाने का कार्य सार्द्रिनी ने करवाया है| अच्छा होना ही आवश्यक नहीं, बुद्धिमान होना भी अनिवार्य है|

नरेंद्र सिंह कपूर

पुस्तक: खिड़कियां

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